(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.94. अध्यायः 094
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
कर्णप्रलपितम्॥ 1॥ क्रुद्धं भीमं निवार्य युधिष्ठिरस्य धृतराष्ट्रसमीपगमनम्॥ 2॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

कर्ण उवाच॥

या नः श्रुता मनुष्येषु स्त्रियो रूपेण संमताः।
तासामेतादृशं कर्म न कस्याश्चन शुश्रुम॥ 2-94-1(15152)
क्रोधाविष्टेषु पार्थेषु धार्तराष्ट्रेषु चाप्यति।
द्रौपदी पाण्डुपुत्राणां कृष्णा शान्तिरिहाभवत्॥ 2-94-2(15153)
अप्लवेऽम्भसि मग्नानामप्रतिष्ठे निमज्जताम्।
पाञ्चाली पाण्डुपुत्राणां नौरेषां पारगाऽभवत्॥ 2-94-3(15154)
वैशम्पायन उवाच॥ 2-94-4x(1685)
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनः कुरुमध्येऽत्यमर्षणः।
स्त्री गतिः पाण्डुपुत्राणामित्युवाच सुदुर्मनाः॥ 2-94-4(15155)
भीम उवाच॥ 2-94-5x(1686)
त्रीणि ज्योतींषि पुरुष इति वै देवलोऽब्रवीत्।
अपत्यं कर्म विद्या च यतः सृष्टाः प्रजास्ततः॥ 2-94-5(15156)
अमेध्ये वै गतप्रामे शून्ये ज्ञातिभिरुज्झिते।
देहे त्रितयमेवैतत्पुरुषस्योपयुज्यते॥ 2-94-6(15157)
तन्नो ज्योतिरभिहतं दाराणामभिमर्शनात्।
धनञ्जय कथं स्वित्स्यादपत्यमभिमृष्टजम्॥ 2-94-7(15158)
अर्जुन उवाच॥ 2-94-8x(1687)
न चैवोक्ता न चानुक्ता हीनतः परुषा गिरः।
भारत प्रतिजल्पन्ति सदा तूत्तमपूरुषाः॥ 2-94-8(15159)
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि।
सन्तः प्रतिविजानन्तो लब्धसम्भावनाः स्वयम्॥ 2-94-9(15160)
भीम उवाच॥ 2-94-10x(1688)
इहैवैतानहं सर्वान्हन्मि शत्रून्समागतान्।
अथ निष्क्रम्य राजेन्द्र समूलान्हन्मि भारत॥ 2-94-10(15161)
किं नो विवदितेनेह किमुक्तेन च भारत।
अद्यैवैतान्निहन्मीह प्रशाधि पृथिवीमिमाम्॥ 2-94-11(15162)
इत्युक्त्वा भीमसेनस्तु कनिष्ठैर्भ्रातृभिः सह।
मृगमध्ये यथा सिंहो मुहुर्मुहुरुदैक्षत॥ 2-94-12(15163)
सान्त्व्यमानो वीक्षमाणः पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा।
खिद्यत्येव महाबाहुरन्तर्दाहेन वीर्यवान्॥ 2-94-13(15164)
क्रुद्धस्य तस्य स्रोतोभ्यः कर्णादिभ्यो नराधिप।
सधूमः सस्फुलिङ्गार्चिः पावकः समजायत॥ 2-94-14(15165)
भ्रुकुटीकृतदुष्प्रेक्ष्यमभवत्तस्य तन्मुखम्।
युगान्तकाले सम्प्राप्ते कृतान्तस्येव रूपिणः॥ 2-94-15(15166)
युधिष्ठिरस्तमावार्य बाहुना बाहुशालिनम्।
मैवमित्यब्रवीच्चैनं जोषमास्वेति भारत॥ 2-94-16(15167)
निवार्य च महाबाहुं कोपसंरक्तलोचनम्।
पितरं समुपातिष्ठद्धृतराष्ट्रं कृताञ्जलिः॥ ॥ 2-94-17(15168)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि चतुर्नवतितमोऽध्यायः॥94 ॥

Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Footnotes
2-94-16 जोषं तूष्णीम्॥


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